बोल वाणी मधुमती

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बोल वाणी मधुमती

या ते॑ जि॒ह्वा मधु॑मती सुमे॒धा
अग्ने॑ दे॒वेषू॒च्यत॑ उरू॒ची ।
तये॒ह विश्वाँ॒ अव॑से॒ यज॑त्रा॒ना सा॑दय
पा॒यया॑ चा॒ मधू॑नि ॥

ऋग्वेद 3/57/5

बोल वाणी मधुमती,
सत्यरूप ज्ञानमयी
आनन्द मंगलकारी,
मृदुल प्रेम भाव भरी

आत्मिक प्रयत्नों से,
सुहाये हृदय सुक्षेत्र
सद्विचार धारे मन में,
वाणी हो जाये पवित्र
लाये व्यवहार मधुरता,
मधुर वचन हर लेवे मन
मधुर बोल, मनहर वाणी,
क्लेश दु:ख मिटाये कई
बोल वाणी मधुमती,
सत्यरूप ज्ञानमयी
आनन्द मंगलकारी,
मृदुल प्रेम भाव भरी
बोल वाणी मधुमती,

सुप्रभात रातें मीठी,
धूलि धरा की है मीठी
वायु मीठी नदियाँ औषधि,
वनस्पतियाँ हैं मीठी
सूर्य चन्द्र तारे मीठे,
भाँति भाँति ऋतुएँ मीठी
वेदज्ञान ईश्वर का है,
ईश्वर की वाणी मीठी
बोल वाणी मधुमती,
सत्यरूप ज्ञानमयी
आनन्द मंगलकारी,
मृदुल प्रेम भाव भरी
बोल वाणी मधुमती,

तू पिला प्रभु वेदामृत,
होवे सबका सुख हित
जो करे विशाल आत्मा,
मन बुद्धि और चित्त
सुमेधा वाणी में पायें,
प्रेम बुद्धि ऋत सत्य
प्रकटे जो दिव्य भाव,
समर्पित प्रभु के प्रति
बोल वाणी मधुमती,
सत्यरूप ज्ञानमयी
आनन्द मंगलकारी,
मृदुल प्रेम भाव भरी
बोल वाणी मधुमती,

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
राग :- यमन कल्याण
तर्ज :- धरित्रीच्या कुशीमधे बियबियाणं
निजली वर पसरली माती जशी शाल
शीर्षक :- मधुमती वाणी 77

सुमेधा = परम मेधावी बुद्धि, धारणावती बुद्धि
मधुमती = सत् का पूर्ण प्रकाश होने की अवस्था