हाड़ी के उपदेश ने खामोश कर दिया

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हाड़ी के उपदेश ने खामोश कर दिया

हाड़ी के उपदेश ने खामोश कर दिया,
बदन में जोश भर दिया। । टेक ।।

चहल पहल से महल की चलकर दूर आ गया,
हाड़ी के हुस्न का हृदय में सरूर आ गया,
दुविधा और क्लेश ने खामोश कर दिया,
बदन का जोश हर दिया।।1।।

हरकारे से कहा जाओ मेरे रनवास में,
रानी का संदेश कोई लाओ मेरे पास में,
आस में विशेष ने मद होश दिया,
बदन में रोष भर दिया।।2।।

(धुन प्रेमी)

हरकारा गया रंग महल में
जहां पर थी हाड़ी राणी।
कर जोड़ प्रार्थना करी
कहा राणा ने मांगी सैणाणी।।

(धुन प्रेमी)

हरकारे की बातें सुनकर,
हुई मौन क्रोध में जलभुनकर,
बोली साजन का मुझसे प्यार,
निश्चय ही जीत में करे हार।।

तन होगा वहां मन होगा यहां,
ऐसी हालत में जीत कहां,
उस हार का कारण मैं हूंगी,
यह दाग नहीं लगने दूंगी।।

इस जीवन का बलिदान मेरा,
चाहता है प्राण का प्राण मेरा,
बोली हरकारे थाल उठा,
मेरे सन्मुख लेकर के आ।।

जो धरूं थाल में ढक लेना,
मेरे साजन को दे देना,
फिर दर्द भरा एक पत्र लिखा,
तह कर दातों में लिया दबा ।।

स्तब्ध हुई कुछ देर रुकी,
कुछ मुस्काई आगे को झुकी,
फिर गर्दन पर तलवार मार,
रख दिया थाल में सिर उतार।।

हर कारा देख कर गया कांप,
ले चला थाल बस्तर ढांप,
आंखों में भर कर के पानी,
कहा सैणाणी ले सैनानी ।।

चूड़ा वत ने झट थाल लिया,
ऊपर से कपड़ा अलग किया,
सिर देख क्षणिक बेहोश हुआ,
खामोश हुआ अफसोस हुआ।।

मोह के वशी भूत विलाप किया,
बालों से मुंह को साफ किया,
दांतों से दबी चिट्ठी निकाल,
पढ़ लिया वीर ने सारा हाल।।

जीवन का पाशा बदल गया,
गिरता गिरता झट संभल गया,
लंबे बालों में गांठ लगा,
आधे-आधे दो भाग बना ।।

उन बालों को गल में डाला,
बन गया रानी का सिर माला,
रौद्र रूप धर कर विशाल,
बन गया समर में महाकाल ।।

दुश्मन के लिए चट्टान हुआ,
रानी का अमर बलिदान हुआ,
निज कर्तव्य को निभा गई,
जाति की इज्जत बचा गई।।
बोलो हाड़ी रानी की जय ।।

।। मिलकर बोलो हाड़ी की जय ।।