ऋषि ने जलाई है जो दिव्य ज्योति
तर्ज – यह माना मेरी जां मुहब्बत सज़ा है
ऋषि ने जलाई है जो दिव्य ज्योति
जहां में सदा यों ही जलती रहेगी ।
हज़ारों व लाखों को रस्ता मिलेगा
करोड़ों के जीवन बदलती रहेगी ।
अविद्या, अभाव और अन्याय जड़ से ,
हिलाने, जलाने, मिटाने की खातिर।
दयानन्द के जां निसारों की टोली,
कफ़न बांध सर पे निकलती रहेगी।
जिधर से भी गुज़रेगी जिस वक्त लेकर,
यह हाथों में पाखण्ड, खण्डनी पताका।
धर्म देश जाति के सब दुश्मनों को ,
यह पैरों के नीचे मसलती रहेगी।
पहाड़ों से भिड़ना तूफानों से लड़ना,
जनम से ही हम को सिखाया ऋषि ने।
सदा मुश्किलों से, निडर जूझने की,
तमन्ना दिलों में मचलती रहेगी ।
सुनो कान धर कर ऐ दुनियां के लोगो,
”पथिक” आज से इन दीवानों की मस्ती।
सदाचार का भाल ऊंचा करेगी,
दुराचार का सर कुचलती रहेगी।










