दया व आनन्द का भण्डार दयानन्द थे।
दया व आनन्द का भण्डार दयानन्द थे।
दिव्य शक्तियों का चमत्कार दयानन्द थे।
अग्नि के समान प्रखर तेजमय स्वरूप था,
वज्र के समान हाथ पांव सेहतमन्द थे।
पृथ्वी के समान सहनशीलता थी देह में,
गगन के समान सदा हौसले बुलन्द थे।
पवन के समान सुघड़ बाजुओं में ज़ोर था,
सैंकड़ों तूफ़ान उन की धमनियों में बन्द थे।
सत्य वेद धर्म उन्हे जान से अज़ीज थे,
छल कपट फ़रेब दग़ा झूठ नापसन्द थे।
चन्द्रमा की चांदनी सी चक्षुओं में चमक थी,
मधुर मधुर शब्द मृदुल कण्ठ की सुगन्ध थे।
भावमय हृदय में थी गंभीरता समुद्र की,
विश्व के इतिहास को लगाए चार चन्द थे।
’पथिक’ धर्म कर्म सभी वेद के अधीन थे,
सम्प्रदाय तन्त्र से स्वतन्त्र व स्वछन्द थे।
कहो किसने आकर कहो किसने आकर
कहो किसने आकर के हम को जगाया ।
दयानन्द आया, दयानन्द आया ।
लुटेरों से आकर किसने बचाया ।
दयानन्द आया, दयानन्द आया ।
अनाथों का कोई ठिकाना बचाया ।
बिलखते थे बच्चे को खाना नहीं था।
कहो किसने अनाथालय खुलवाया ।
दयानन्द आया, दयानन्द आया ।
थे नारी को पैरों की जूती बताते ।
नहीं कोई नारी को विद्या पढ़ाते ।
कहो इनको अधिकार किसने दिलाया ।
दयानन्द आया, दयानन्द आया ।
अछूतों को ठुकराता सारा जमाना,
बड़ी भूल की थी समझकर बेगाना।
कहो इनको छाती से किसने लगाया ।
दयानन्द आया, दयानन्द आया ।
बन जाते थे हिन्दु मुस्लिम ईसाई,
उतारे जनेऊ थी चोटी कटाई।
शु़िद्ध की बूटी को किसने पिलाया ।
दयानन्द आया, दयानन्द आया ।
कहो वेद की बंसी किसने बजाई,
धर्म हेतु मरने की कला सिखलाई ।
कहो जड़ की पूजा को किसने छुड़ाया ।
दयानन्द आया, दयानन्द आया ।










