एक तरफ था देव दयानन्द

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एक तरफ था देव दयानन्द

तर्ज – एक ताल पर तोता बोले

एक तरफ था देव दयानन्द ,
एक तरफ जग सारा ।
लाखों संकट सहे ऋषि ने ,
सत पथ नहीं विसारा ।
ऋषिवर प्यारा-दयानन्द प्यारा।

आर्य जाति की रक्षा हेतु ,
तन की सुध बिसराई ।
ताप मोचनी सत्य ज्ञान की ,
ज्योति आन जगाई ।
ज्योति आन , जगाई ,
जग में धूम मचाई ।
वेद ज्ञान का सूरज चमका
दूर किया अधियारा ।
ऋषिवर प्यारा-दयानन्द प्यारा।।१।।

सहनी पड़ी विकट बाधायें ,
विध्न विपदा पथ आये ।
आगे बढ़ते रहे निरन्तर ,
किन्चित न धबराये ।
किंचित ना धबराये ,
आगे कदम बढ़ाये ।
पोप और पाखण्डी भागे ,
कर गये सभी किनारा ।
ऋषिवर प्यारा-दयानन्द प्यारा।।२।।

स्वंय पिया विष , जग वालों को
अमृत पान कराया ।
फिरे भटकते जो जन उनको ,
वैदिक पथ दर्शाया ।
वैदिक पथ दर्शाया ,
पापों से था बचाया ।

सभी विरोधी बने ऋषि के
प्रभु का एक सहारा ।
ऋषिवर प्यारा-दयानन्द प्यारा।।३।।

पास न धन, चेली, न चेला,
न कोई शासन बल था ।
साथी संगी सखा ना ’राधव’
प्रभु विश्वास अटल था ।
प्रभु विश्वास अटल था ,
जीवन बना सफल था ।

जन्मे जहाँ पै ऋषि दयानन्द ,
धन्य भूमि टंकारा ।
ऋषिवर प्यारा-दयानन्द प्यारा।।४।।