एक जंगल में नई बस्ती बसा दी तूने ।

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एक जंगल में नई बस्ती बसा दी तूने ।

एक जंगल में नई बस्ती बसा दी तूने ।
वक्ते पत्थर पे सफल जोंक लगा दी तूने ।

लोग मानें या न मानें था करिश्मा कोई ।
अर्थियाँ जितनी उठीं डोली बना दी तूने ।।१।।

सच तो यह है कि किया काम निराला ऐसा ।
आग पानी में दयानन्द लगा दी तूने।।२।।

चाँद सूरज व सितारे भी थे कैद जहाँ।
ऐसे अम्बर पे नई धूप खिला दी तूने।।३।।

जिसके शासन में न छुपता था कभी सूर्य यहाँ ।
ठोकरें मार के कुर्सी ही हिला दी तूने।।४।।

जिनके पावों में न पायल थी न बिंदिया मुख पर ।
ऐसी अबलाओं की दुनिया सजा दी तूने।।५।।

दूसरा कृष्ण तुम्हें कहने को जी करता है ।
वेद की बाँसुरी फिर जग को सुना दी तूने।।६।।

तेरी निष्ठा का भला मूल्य चुकाएँ क्यों कर ।
बुझती हुई वेद शम्माँ फिर से जला दी तूने।।७।।