ओ३म् है ईश्वर हमारा
ओ३म् है ईश्वर हमारा
ओ३म् है जगदाधार
ओ३म् है निर्लेप नियन्ता
ओ३म् है करतार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
ओ३म् अनाहत नाद है
ओ३म् सामवेद का गान
ओ३म् है वाणी की वाणी
ओ३म् शब्द का सार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
परम शान्ति के प्रदाता
प्रेमामृत परमेश
अन्तर आनन्द दे रहा है
अजन्मा अविकार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
ओ३म् केवल ओ३म्
प्रभु ओ३म्, प्रभु ओ३म्, केवल ओ३म्
तुरीयातीत है तत्त्व रूप (1)
भरा भीतर ब्रह्माण्ड
ग्रह नक्षत्र सूर्य चन्द्र
वायु व्योम विहार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
प्राणों के वो है प्रणेता
परम पूर्ण काम
साक्षी है घट-घट निवासी
मुक्त मङ्गलाकर
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
है अकाल वो, काल काल का
मृत्यु रूप महाकाल
घड़ी पल दिन रात मिला के
युग बनाया चार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
आकर फिर जाता रहे जो
उसके लिए हे त्रिकाल
सत्य सनातन स्थिर है प्रभु
अखण्डित विस्तार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
ओ३म् केवल ओ३म्
प्रभु ओ३म्, प्रभु ओ३म्, केवल ओ३म्
उपनिषदों षड् शास्त्रों में
किया उसी का बखान
ऋषि महर्षि कर रहा है
एक ही नाम पुकार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
है अरूप अनाम उसका
अनगिनत है नाम
अनन्त है आकाश उसमें
अनादि है आधार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
आगे पीछे ऊपर नीचे
दूर समीप समाय
अणु अणु में आप विराजे
अवनि पर एकतार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
गुरु गुरुत्मान है वो
आदि गुरु है एक
शास्त्र ऋचा सूत्र संहिता
अक्षर अनराधार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
ओ३म् केवल ओ३म्
प्रभु ओ३म्, प्रभु ओ३म्, केवल ओ३म्
सर्व द्रष्टा है सर्वज्ञ वो
सर्व शक्ति मान
सर्वाधीश है सबके स्वामी
सबसे बड़ी सरकार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
कृपा करुणा और दयालु
सत्य शुद्ध स्वभाव
लेता नहीं वो कुछ किसी से
देने को है तैयार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
अन्तर्यामी गगनगामी
निर्गुण है गुण धाम
आप अकर्ता सृष्टि कर्ता
निश्चय निराकार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
नहीं जरा सा राग उसमें
कभी न कर्ता द्वेष
प्राणी मात्र के मित्र है वो
देता सबको प्यार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
ओ३म् केवल ओ३म्
प्रभु ओ३म्, प्रभु ओ३म्, केवल ओ३म्
व्यापक सम्पूर्ण सृष्टि पर
विष्णु रूप वरदाय
भक्त जनों के अन्तर भीतर
भद्रभाव भरनार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
योगी यति सन्त सन्न्यासी
धरे हृदय में ध्यान
गाते हैं गुणगान गुणीजन
करते जय जयकार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
पोते नहीं वो नहीं पराया
ना स्थूल है सूक्ष्म सोय
चेतन का भी चेतन है वो
भरा है अन्दर बाहर
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
है विराट वो विश्वव्यापी
भर्गधारी भगवान्
तेज दाता तेजस है वो
दृष्टि के देनहार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
ओ३म् केवल ओ३म्
प्रभु ओ३म्, प्रभु ओ३म्, केवल ओ३म्
हे परमात्मा !! परम आत्मा
परमानन्द के धाम
पतित पावन है परमेश्वर
हरे कष्ट विकार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
नहीं हल्का, नहीं भारी है
ना होता तराजू से तोल
लम्बा चौड़ा, नाप न मिलता है
है अतुल्य अपार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
अन्न अन्नाद वो है अन्नदाता
दीनन के है दयाल
अग्नि बन कर अन्न पकाता
उदर में अविहार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
व्यापक विभु है स्वयम्भू
प्रभु है परब्रह्म
कर्ता कारण रूप है ये
सृष्टि सर्जनहार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
ओ३म् केवल ओ३म्
प्रभु ओ३म्, प्रभु ओ३म्, केवल ओ३म्
आँखों की भी आँख वही है
सुरता के हैं सन्धान
योग धारणा ध्यान समाधि
अन्तर आनन्द द्वार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
वरद विमल विशुद्ध है वो
विचक्षण है विराट
रक्षक प्राणी मात्र के वो
पालन पोषण हार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
कल थे और कल भी रहेंगे
तू आज उसे पहचान
एक अविचल अखण्ड है वो
उसका कर स्वीकार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
नित्य तृप्त है नाथ नियामक
वेद चतुष्ट्य विज्ञान
सकल साधन साध्य समुच्चय
प्रगट पूर्ण प्रसार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
ओ३म् केवल ओ३म्
प्रभु ओ३म्, प्रभु ओ३म्, केवल ओ३म्
है निरूपम प्रतिभा प्रेरक
मुक्ति दाता महान्
सर्वानन्द है शान्ति दायक
स्थापक है ये सन्सार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
वैश्वानर है विश्वम्भर वो
व्याहुति विस्तृत
व्रतपति वो विश्व मित्र है
विश्व व्यापक विस्तार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
प्रजापति परब्रह्म है
वो श्रुति रूप सद्ज्ञान
क्लेश कर्म विपाक निवारक
करता है भव पार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
अभेद अछेद अभय है वो
अक्षय अक्षर ब्रह्म
पुरुष विशेष अप्रगट है
निर्मल निर्विकार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
ओ३म् केवल ओ३म्
प्रभु ओ३म्, प्रभु ओ३म्, केवल ओ३म्
सु कर्माण सुरूच है वो
चेतन चिदानन्द
चर अचर चहु ओर जग को
उसका है आधार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
मंजुल मङ्गल प्रद है वो
शिवम् सत्यम् रूप
है महत् वो महिमावन्त है
मायापति मयस्कार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
सोम शान्त वो है सर्वत्र
भरा हुआ भगवन्त
आदित्य अग्नि रूप है वो
हरता है अन्धकार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
सखा साथी शासक है वो
कर्ता नित कल्याण
अग्रणी है यज्ञ रूप प्रभु
सकल सुख का सार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
ओ३म् केवल ओ३म्
प्रभु ओ३म्, प्रभु ओ३म्, केवल ओ३म्
शतक्रतो सामर्थ्यवान् वो
सत्य स्वरूप सुजान
सुपर्ण और सुमित्र है वो
सबका तारणहार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
गुण नायक है गणपति वो
सगुण गुणातीत
गुणा भाग नहीं जोड़ा जाता
स्वयं गुणाधार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
दूर नहीं पर दूर दृष्टि से
वाणी से नहीं वो वदाय
खट मीठा कोई स्वाद न उसमें
फिर भी है रसदार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
ऐश्वर्य दाता विभु विधाता
दु:ख नाशक दीन दयाल
देता है दिन रात सबको
वरद् हस्त हजार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार
ओ३म् केवल ओ३म्
प्रभु ओ३म्, प्रभु ओ३म्, केवल ओ३म्
“आम्बालाल” अमरपद आशा
ओ३म् भजो मन श्वासो श्वासा
अखण्ड आनन्द उर नहीं निराशा
मिटे यम का मार
भजो मन, अविनाशी ओम्कार
भजो उर, ओ३म् ही बारम्बार










