व्यर्थ ही जन्म ना तुझे खोना चाहिए

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व्यर्थ ही जन्म ना तुझे खोना चाहिए

व्यर्थ ही जन्म ना तुझे खोना चाहिए
दूर विषयों से तुझे होना चाहिए

प्रातः उठ प्रभु-भजन की मस्तियाँ
मन को कितना दे रही हैं आनन्द!
वर्षा में भीगे तरुवल्लरियाँ
वैसे प्रेम रस में होते हैं मगन
ख़ुद को प्रभु भक्ति में यूँ खोना चाहिए
दूर विषयों से तुझे होना चाहिए
व्यर्थ ही जन्म ना तुझे खोना चाहिए
दूर विषयों से तुझे होना चाहिए

स्वार्थ-धन कमाने की ही फ़िक्र में
छद्म-छल-छिद्र में लगा है मन
सोच के प्रपञ्च नित नए-नए
दूसरों का छीनता रहा अमन
दो ही गज़ ज़मीन अन्त में तो चाहिए
दूर विषयों से तुझे होना चाहिए
व्यर्थ ही जन्म ना तुझे खोना चाहिए
दूर विषयों से तुझे होना चाहिए

शोभा इस शरीर की बढ़ाने में
साज और सिंगार में बीता जीवन
मानसिक शरीर तो रहा दुर्बल
पहुँची शुचिता की ना सुन्दर किरण
अपने मन मलिन को धोना चाहिए
दूर विषयों से तुझे होना चाहिए
व्यर्थ ही जन्म ना तुझे खोना चाहिए
दूर विषयों से तुझे होना चाहिए

कैसे सङ्गी कैसे मित्र हैं तेरे ?
कैसे हैं आदर्श कैसा आचरण ?
कर्म उनके हैं “ललित” या पतित
करते हैं दु:खी या दे रहे आनन्द
मित्र का तो दु:ख में साथ होना चाहिए
दूर विषयों से तुझे होना चाहिए
व्यर्थ ही जन्म ना तुझे खोना चाहिए
दूर विषयों से तुझे होना चाहिए

इन्द्र के नियम तो हैं सदा अटल
जैसे बीज बोएँ वैसे पाएँ फल
सोम-सवन करने वालों को प्रभु
अपना तेज देकर करते सफल
बीज सत्यकर्म का ही बोना चाहिए
दूर विषयों से तुझे होना चाहिए
व्यर्थ ही जन्म ना तुझे खोना चाहिए
दूर विषयों से तुझे होना चाहिए
दूर विषयों से तुझे होना चाहिए