चलो जयकार ऋषि की प्रेम से मिलकर सभी बोलें,
जो मार्ग सत्य का ऋषि ने बताया ना कभी भूलें ॥
जगाया था जमाने को ऋषि ने वेदविद्या से
उठाया दलित गौ नारी को ऋषि ने निज प्रतिज्ञा से,
सकल संसार रह जाएगा सोया आर्य गर सो लें ॥ चलो जयकार..
धर्म के कई मतों को लाए पाखण्डी बाजारों में
उठाया वेद विद्या से, जो थे अविद्या के गारों में
शुरु है सिलसिला, ऋषि की तरह हम वेद को खोलें ॥ चलो जयकार…
सहीं जो विपदा हमने सदियों से इस गुलामी की
मिला स्वराज्य कृपा महर्षि दयानन्द स्वामी की
दशा है आज भी बदतर फटें बम और उठें शोले ॥ चलो जयकार…
खिलाया था चमन को सत्य अहिंसा के फूलों से
बचाया था ऋषि ने घोर अविद्या जैसे शूलोंसे
बहारें इस चमन को लहलहाकर ही सदा झूलें ॥ चलो जयकार…
बदल दी जग की काया चारों वेदों की विद्या से
बचाया जग को भ्रम के जाल से तम से अविद्या से
सरस वेदों का अमृत आओ मिलकर जग में हम घोलें ॥ चलो जयकार…
धर्म के वास्ते ऋषि ने लगाई दाव अपनी जाँ
अभय थे वीर ऋषि असत्य के आगे झुकी ना शान,
तराजू ज्ञान को लेकर सदा तुम सत्य को तोलो ॥ चलो जयकार…
दया करुणा अहिंसा त्याग सेवा थी दयानन्द में
हज़ारों कष्ट आए फिर भी ऋषि को पाया आनन्द में
ये सत्कर्मों की शिक्षा पा के हम भरें ज्ञान से झोले ॥ चलो जयकार…










