आज ऋषिवर सा कोई भी मिलता नहीं

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आज ऋषिवर सा कोई भी मिलता नहीं

याद आई ऋषि की तो हम रो पड़े (2)

वक्त से पहले ऋषिवर को खोने का दर्द

हम छुपाने लगे ये मगर रो पड़े (2)

स्वार्थी लोभी थे मचाए कहर

कश्तियाँ बेहिसाब पड़ी थी भँवर

कष्ट सन्ताप सहते रहे बेखबर

धर्म का रास्ता भी ना आया नज़र

देख दुःखियों को ऋषिवर ने नैन भरे

पोंछते पोंछते आँसू खुद रो पड़े ॥ आज ऋषिवर…

धर्म था पर अधर्म पनपाता रहा

जुल्म बेबस की आँखों सा रोता रहा

कृष्ण की गौ कटी नारी हो गई सति

जागा केवल ऋषि जग तो सोता रहा

आँसुओं की ये नदियाँ बहीं बेवजह

सहमी धरती ये बादल बरस रो पड़े ॥ आज ऋषिवर…

मान करते थे ऋषि हर कौम का

और लगाया था नारा इक ओ३म् का

वेद के सत्य का ऋषि को आधार था

सर झुका के ये विषवदाता भी रो पड़े ॥ आज ऋषिवर…

बस यहीं जान लो दुनियाँ वालो, आर्य रखते हैं श्रद्धा दयानन्द पे

दिल में मौजूद है त्याग प्रेम दया, जाएँ बलिहार हम उस दयावन्त के

की दया ऋषि ने थे विषदाता बेहरम

हँसते-हँसते गए ऋषिवर हम रो पड़े ॥ आज ऋषिवर…

आर्यों आया समय हम मिटाएँ कलह

आज अन्धकार का मिलके कर दें प्रलय

कर दें इक भाषा इक धर्म एक संस्कृति

सूर्य वैदिक धर्म का ही लाए सहर

पापी लोभी पाखण्डी ना पाएँ पनाह

वक्त आए वो करनी पे खुद रो पड़ें ॥ आज ऋषिवर…