रो दिया सारा जमाना ऋषि की जाँ निसार पर

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रो दिया सारा जमाना ऋषि की जाँ निसार पर

तर्ज: सो गया सारा ज़माना

रो दिया सारा जमाना ऋषि की जाँ निसार पर
बादलों रोना गरजकर आसमाँ से हार कर ॥
चाँद पहले भी निकलता था ऋषि के वक्त पर
आज वैसी चाँदनी खिलती नहीं संसार पर ॥ रो दिया सारा…

ऐ समाँ तू जा के ला दे जज्बा वो दयानन्द का
आ तू ऐ वादे सबा दया प्रेम त्याग की राह पर ॥ रो दिया सारा…

जो सजाया बाग ऋषि ने अपने ही पुरुषार्थ से
उस चमन को सींच कर तू बहार ही बहार कर ॥ रो दिया सारा…

सत्य का श्रृंगार था दयानन्द के तनमन वचन पर
तू भी मानव जिन्दगी में सत्य का शृंगार कर ॥ रो दिया सारा…

जो तमन्ना दिल में बाकी थी ऋषि दयानन्द की
सारी दुनियाँ को उठाना वेद के आधार पर ॥ रो दिया सारा…