लुटे लुटे से थे हम बाग थे उजड़ते चले

0
13

लुटे लुटे से थे हम बाग थे उजड़ते चले

तर्ज: रुके रुके से थे हम

लुटे लुटे से थे हम बाग थे उजड़ते चले
बहार आई ऋषि की कृपा से फूल खिले ॥ लुटे लुटे से…

जहालतों में फँसे लोग हुए थे दिले जार
छुड़ाया पजों से उनको जो जा रहे थे छले ॥ बहार आई…

न खंजरों का कोई ख़ौफ था दयानन्द को
जो बेरहम थे झुके ऋषि की दया के तले ॥ बहार आई…

जुबाँ पे थी वो गजब कशिश दयानन्द की
ऋषि की शीरी जुबाँ ने मिलाए बिछड़े गले ॥ बहार आई…

न सौदा सत्य का शौहरत या दौलतों में तुला
तुला पे सत्य का उतना वजन दिखाते चले ॥ बहार आई..

जहर को पी, सो गए नींद के जो पहलू में
श्री नींद ऐसी जहाँ को ऋषि जगा के चले ॥ बहार आई…

न लूट ले कभी फिर से हमें ये दौरे जुनूं
हटें जो द्वेष जमाने को साथ लेके चलें ॥ बहार आई…