लुटे लुटे से थे हम बाग थे उजड़ते चले
बहार आई ऋषि की कृपा से फूल खिले ॥ लुटे लुटे से…
जहालतों में फँसे लोग हुए थे दिले जार
छुड़ाया पजों से उनको जो जा रहे थे छले ॥ बहार आई…
न खंजरों का कोई ख़ौफ था दयानन्द को
जो बेरहम थे झुके ऋषि की दया के तले ॥ बहार आई…
जुबाँ पे थी वो गजब कशिश दयानन्द की
ऋषि की शीरी जुबाँ ने मिलाए बिछड़े गले ॥ बहार आई…
न सौदा सत्य का शौहरत या दौलतों में तुला
तुला पे सत्य का उतना वजन दिखाते चले ॥ बहार आई..
जहर को पी, सो गए नींद के जो पहलू में
श्री नींद ऐसी जहाँ को ऋषि जगा के चले ॥ बहार आई…
न लूट ले कभी फिर से हमें ये दौरे जुनूं
हटें जो द्वेष जमाने को साथ लेके चलें ॥ बहार आई…










