सोते थे आन जगाये री
सोते थे आन जगाये री,
टंकारा वाले ने, वेदों को भूल रहे थे,
चल प्रतिकूल रहे थे,
हम सन्मार्ग पै लगाये री,
टंकारा वाले ने ।।1।।
पापों की खुली थी मंडी,
लूटे थे पोप पाखंडी,
पाखंडों के गढ़ ढाये री,
टंकारा वाले ने।।2।।
यहां पादरी मुल्ला काजी,
कर रहे थे अपनी राजी,
उनके मुंह बंद कराये री,
टंकारा वाले ने ।।3।।
अनगिन बेवा रोती थी,
तज शर्म धर्म खोती थी,
यहां पुनर्विवाह करवाये री,
टंकारा वाले ने।।4।।
नारी सत्कार नहीं था,
पढ़ने का अधिकार नहीं था,
कन्या गुरुकुल खुलवाये री,
टंकारा वाले ने।।5।।
झाड़े झपटे लावें थे,
सबको बहकावे थे,
वह झूठे भगत भगाये री,
टंकारा वाले ने ।।6।।
नांगे औघड़ कनफाड़े,
मारें थे माल लुंगाड़े,
साधु के अर्थ समझाये री,
टंकारा वाले ने ।।7।।
धोके थी धक्के खानी
तज शीतला ढेढ मसानी,
सासू के चरण पुजाये री,
टंकारा वाले ने ।।8।।
जाने कितने व्रत करें थीं,
नाहक ही भूखी मरें थीं,
पतिव्रता के नियम बताये री,
टंकारा वाले ने।।9।।
शोभाराम वीरेन्द्र,
ना गाते गीत यहां पर,
वीर-ठाकुर प्रेमी बनाये री,
टंकारा वाले ने।।10।।










