वेद धर्म को भूलकर हो गया देश बदनाम री
वेद धर्म को भूलकर हो गया देश बदनाम री
कोई कहने वाला न रहा।
जहां हवन नित्य होता था और वेदों के पाठ री।
अब वहां मुस्टंडे नाचते,
और हुक्कों की गड़गड़ाहट री,
कोई कहने वाला न रहा।।1।।
कुत्ते कुतिया पालते मुर्गी पर मिले इनाम री,
कही ग्याभन गैया मात का,
यहां हो रहा कत्लेआम री।
कोई कहने वाला न रहा।।2।।
बाली विधवा रो रही
दुखिया का ख्याल कुछ न रहा,
और साठ साल का बाप
बिधुर ब्याह करने जा रहा।
कोई कहने वाला न रहा।।3।।
कुवारी छोरी बाप के,
यहां चलती है स्याही घालके,
कहीं एक जगह एक साथ
जन्मे सास बहू के बालके।
कोई कहने वाला न रहा।।4।।
दो चोटी करके चलें और चाबे अण्डे पान री,
अब उनका स्वागत कर रहे
यहां मन्त्री और प्रधान री।
कोई कहने वाला न रहा।।5।।
क्षत्री डाके डालते, और खावें मदिरा मांस री,
यहां ब्राह्मण आल्हा बाँचते,
और बणिया खेलें तास री।
कोई कहने वाला न रहा।।6।।
जिस कुर्सी के राम ने,
और भरत ने मारी लात री,
अब उस कुर्सी के वास्ते,
दिन रात करें उत्पात री।
कोई कहने वाला न रहा।।7।।
बेटे पोते तास खेलें,
बुड्ढे कर रहे काम री,
सासू बासन मांजती,
और बहू करे आराम री।
कोई कहने वाला न रहा।।8।।
सिंघाड़े बोने छोड़ के
बो रहे जोहड़ में मीन री,
दूध शुद्ध घी ना मिले
चलें नकली घी के टीन री।
कोई कहने वाला न रहा।।9।।
साधू की जमा बैंक में हैं,
गृहस्थी दुःखी अपार री,
सतियों का सम्मान ना,
यहां रांड करें सिंगार री।
कोई कहने वाला न रहा।।10।।
लोटा हो तो छन भी जा,
कुएं में मिल रही भांग री,
अब शोभाराम मेरे,
देश की है हालत ऊट पटांग री।
कोई कहने वाला न रहा।।11।।










