जरा चलना सम्भल सम्भल के
जरा चलना सम्भल सम्भल के
कभी गिर जाये पैर फिसल के
चिकनी बटिया है ओ चिकनी
बटिया है जीवन की।।टेक ।।
विषय रूपी बहुत लुटेरे जीवन के
ग्राहक तेरे बैठे है मग को
धेरे राह बतलाई है जीवन की ।।1।।
जमा कोष धर्म का धन कर,
नव द्वार पार बस मनकर
आगे बढ़ने का यत्न कर,
विजय हो आई है जीवन की।।2।।
जहां सावधानी हट जायेगी,
वही दुर्घटना घट जायगी
चित्त वृत्तियों में बट जायेगी
जो पुण्य कमाई है जीवन की ।।3।।
प्रेमी एक तेरा हिमाती,
शुभ कर्म है सच्चा साथी
पग-पग पै मिटाना चाहती,
घृणित बुराई है जीवन की।।4।।










