कैसे चाबी दें दुश्मन को
कैसे चाबी दें दुश्मन को,
सजे हुये अपने घर की
इसकी रक्षा हेतु आज हम
बाजी लगा रहे सर की।।टेक।।
आयु भर बिन वस्त्र नंगे,
तन रहना स्वीकार हमें
भूख प्यास का वर्षों तक है,
दुःख सहना स्वीकार हमें
मगर गुलामी सहन करेंगे,
नहीं कभी भी पल भर की।।1।।
अनगिन वीरों की बलि देकर के,
यह भवन सजाया है इस घर की
रक्षार्थ दाव पर हमने जीवन
लाया है बना के धूल उड़ा देगें,
हम हमलावर निश्चर की।।2।।
अन्याय जुल्म की हद होली,
इन्तजार अमन की हद होली
सीने में खाकर गोली
हम दुश्मन के मारे गोली
गूंज रही आवाज आज,
यह चारों और नारी नर की।।॥3।।
चिन्ता नहीं हमें किंचित भी
दुश्मन के हथियारों की
चिन्ता रहती है केवल
हमको जयचन्द गद्दारों की
शोभराम प्रेमी अन्दर की चिन्ता है,
नहीं बाहर की।॥4॥










