आदि सृष्टि से यह सब कुछ हो रहा है

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आदि सृष्टि से यह सब कुछ हो रहा है

आदि सृष्टि से यह सब कुछ हो रहा है,
भाग का चिर भार मानव ढो रहा है।


बस इसे ही जिन्दगी या खेल कह लो,
आदमी कुछ पा रहा कुछ खो रहा है।।