लक्ष्मण भ्रात जानकी नौका में बैठे रघुराई।
लक्ष्मण भ्रात जानकी
नौका में बैठे रघुराई।
राजीव नयन से आज्ञा ले
केवट ने नाव चलाई॥
चले राम सिया राम ॥ टेक ॥
कर्म के रेख नहीं टरते हैं
राम बने बनवासी ।
वल्कल वस्त्र धारकर
तन में मन में उदासी ॥
दासी बनकर चली चरणों की
संग जनक की जाई॥1॥
बनवास राम को हुआ साथ में
यह व्रतधारी कौन चला।
कमर पै तरकस खड़ग बाण
गम्भीर वीर हो मौन चला।
पला है जिसकी गोदी में है
धन्य सुमित्रा माई॥2॥
महलों में पली कोमल तन है
मुख चन्द्र सा ये मृगनयनी।
राम की रानी तपस्वनी बनी
जो थी कुशल गृहणी ॥
धरनी पर हो शयन सेज
महलों की है ठुकराई॥3॥
पार किया गंगा को नौका
आन रुकी थी तट पर।
आखिर कुछ देना है
राम की दृष्टि थी केवट पर॥
कर्मठ पर कुछ नहीं है
कैसे दूंगा अब उतराई॥4॥
वार्ता-श्रीराम के वन से
लौटने में केवल एक दिन
चौदह वर्ष की अवधि में शेष है
जिसके लिए श्री भरत जी बार-2
श्रीराम को याद करते हैं।










