धन्य है महर्षि धन्य है धन्य है
धन्य है महर्षि धन्य है धन्य है,
धन्य है वेद वीणा बजाकर गया।
धन्य आना तेरा सच के श्रृंगार से,
आत्मा को तू अपनी सजाकर गया॥टेक
धन्य जननी है धन्य तेरी कोख को,
मूलशंकर सा जो रत्न पैदा किया।
ज्ञान का सूर्य जिसने चमका दिया,
सारे जग का अंधेरा मिटाकर गया॥1॥
धन्य मन्दिर जाकर तेरा जागना,
धन्य शिवरात्री बोध की वो घड़ी।
टूटेगी सदियों के बन्धनों की कड़ी,
लहर क्रान्ति की ऐसी चलाकर गया॥2॥
धन्य गुजरात टंकारा की भूमि को,
धन्य मथुरा से कुटिया विरजानन्द की।
जहां पै जागी प्रतिभा दयानन्द की,
दुर्ग पाखंडियों के हिलाकर गया॥3॥
धन्य आना तेरा जाना भी धन्य है,
इस तरह से कोई जाते देखा नहीं।
चाँद के मुख पै धब्बा भले ही सहीं,
धब्बों से अपना दामन बचाकर गया॥4॥
धन्य भारत को जो देवों की भूमि है,
धूल में तेरी खोल कभी मूल भी।
राहों में जिसको कर्मठ मिले शूल ही शूल,
चुगता गया गुल खिलकर गया॥5॥










