वीर अमर बलिदानी सर की भेंट चढ़ाकर चले गये।

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वीर अमर बलिदानी सर की भेंट चढ़ाकर चले गये।

वीर अमर बलिदानी सर की
भेंट चढ़ाकर चले गये।
आजादी की दुल्हन का
श्रृंगार सजाकर चले गये।
गांधीवादियों की टोली जब
आँख मिचोनी खेल रही थी।


नयी योजनायें हर दिन ही
बन बनकर हो फेल रही थी॥
क्रान्तिकारियों की टुकड़ी उस
वक्त मुसीबत झेल रही थी।
किसी को फांसी किसी को
काले पानी की हो जेल रही थी।।
अंडमान में कितने तन की
खाल खिंचवाकर चले गये ॥1॥

हिलने लगी थी धरा फिरंगी के
जब अत्याचारों से।
होले से भुन रही थी जनता
गोलियों की बौछारों से॥


भगत राजगुरु शेखर बिस्मिल
खेल गये अंगारों से।
वन्दे मातरम् इन्कलाब के
गगन गूँज गया नारों से॥
मदन धींगरा ऊधम लन्दन को
दहलाकर चले गये॥2॥

कांग्रेस का सत्याग्रह जब
दम ले लेकर सिसक रहा था।
तब रंगून में नेताजी इतिहास
खून से लिख रहा था॥
सामने अंग्रेजों को अपनी मौत का
तूफां दिख रहा था।
टूट चुकी थी गोरा शाही पैर
नहीं कहीं टिक रहा था॥
आजाद हिन्द सेना का ऐसा
बिगुल बजाकर चले गये॥3॥

गुजरे साल पचास स्वतंत्रता
उलझ रही है श्वासों पर ॥
भस्मीभूत हो गया राष्ट्र
नेताओं के विश्वासों पर॥
स्वर्ण जयन्ती वर्ष मनाया
मजलूमों की लाशों पर।
राज्य की सत्ता टिकी कर्मठ
अपराधियों पर बदमाशों पर॥
आतंकवादी की संज्ञा उन्हें
जो फांसी खाकर चले गये॥4॥