मुझे देखकर माँ क्यों रो रही है।

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मुझे देखकर माँ क्यों रो रही है।

मुझे देखकर माँ क्यों रो रही है।
चला मैं वतन के लिये सर कटाने॥
ऐसी हंसी मौत मिलेगी किसे माँ।
खुशी है हमें मर कर, फिर भी तो आने॥

सोचे थे जो काम हो ना सके पूरे।
रहें ज्यों के त्यों अरमां मन में अधूरे ॥
आजाद कर ना सके हम वतन को।
लगी मौत हमको अभी से बुलाने ॥1॥

हमारा लहू रंग लाकर रहेगा।
निशां दुश्मनों का मिटा कर रहेगा।
जुल्मों सितम सब मिट जायेंगे।
दिन नजदीक हैं कोई माने न माने॥2॥

बुझेगी ना आग ऐसी लगाकर चले हैं।
सोते वतन को जगाकर चले हैं।
कसम है तुझे माँ हंस एक बार तो तू।
लगी है क्यों आँखों से आंसू बहाने॥3॥

तेरा दूध पीकर लजाया नहीं है।
गुलामी का जीवन भाया नहीं है।
मर्यादा होती है जो आर्यों के कुल की।
माँ उसे ही चला हूँ कर्मठ आज मैं निभाने ॥4॥