याद आई है बहन की याद आई है।

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याद आई है बहन की याद आई है।

याद आई है बहन की याद आई है।
रोया चिट्ठी पढ़कर मेरी बहन मरी जलकर॥
बदन की खाक बनाई है।
याद आई है….

लिखा बहन ने भैया मेरे,
क्या आई नहीं याद मैं तेरे।
वचन दिया था चलते मुझको,
आऊँगा मिलने मैं तुझको॥
पहले भी खत चार लिखे हैं,
इन्तजार में दिन बीते हैं।
सोचता होगा बहन सुखी है,
देखता आकर कितनी दुखी है।
गम में ही जीती हूँ,
नहीं खाती पीती हूँ।
पति को भी मुझसे बेरुखी है॥1॥
याद आई है…

कुछ भी खता नहीं इसमें तेरी,
ऐसी ही तकदीर थी मेरी।
देखने में तो वर अच्छा था,
वर अच्छा था घर अच्छा था।
पर आई बारात सजी थी,
खुशियों की शहनाई बजी थी।
मण्डप में सखियों ने बिठाई
पाणिग्रहण की रीत निभाई॥
याद आई है बहन की याद आई है॥2॥

हाथों में मेहदी भी रची थी,
मांथे पर बिन्दिया भी सजी थी।
मंगल सूत्र सुहाग के कंगन,
पहन के बन गई थी मैं दुल्हन॥
सब कुछ ही शादी में किया था,
जो देना था वह भी दिया था।
चला गया डोली में बिठाकर,
पछताई ससुराल में जाकर ॥
याद आई है बहन की याद आई है॥3॥

मुश्किल हो गया जीना पल-पल
आंसुओं में ढला आँख का काजल।
दहेज का वह सामान देखकर,
ताने दिये आंगन में फेंककर ॥
नागिन बन गई सास थी मेरी,
बहन बन्द कमरे में की तेरी।
ननद जेठानी देवर तक ने,
मिलकर के पीटा था सबने ॥
याद आई है बहन की याद आई है॥4॥

बन्द था खाना मिला न पानी,
एक दिन मरने की मैं ठानी।
पिटते-पिटते जगी न सोई,
बहुत याद करके तुझे रोई॥
भूल गया मुझको तू जाकर,
एक बार तो देखता आकर।
सोच लिया जीकर क्या करूंगी,
इस जीवन का त्याग करूंगी।
किन याद आई है बन की याद आई है॥5॥

बीत गया बिन बरसे सावन,
पकड़ लिया अब मौत का दामन ।
अब तू आना या मत आना,
मुश्किल मेरे से मिल पाना॥
किसे पता है कर्म भाग्य का,
कफन ही जोड़ा बने सुहाग का।
कर्मठ इस जीने से डरती,
बहन तेरी जलकर के मरती॥
याद आई है बहन की याद आई है॥6॥