जब जब सरहद के ऊपर खतरों के बादल छाये।

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जब जब सरहद के ऊपर खतरों के बादल छाये।

जब जब सरहद के ऊपर
खतरों के बादल छाये।
हैं धन्य वतन के सिपाही
जा दुश्मन से टकराये ॥
छुपकर या सम्मुख
आकर जब दुश्मन ने ललकारा।
गये कूद समर में सेनानी
तन देश के ऊपर वारा॥

लड़ते रहे अन्त समय
तक नहीं पीछे कदम हटाया।
रहे गौरव राष्ट्र का
अपने-अपने को भेंट चढ़ाया ॥
हो गये अमर बलिदानी
जो काम वतन के आये॥1॥

रक्षा हित मातृभूमि की बांधा था
कफन को सर पर।
कारगिल कशमीर न देगें
कहकर के चले थे घर पर॥
हो गये शहीद जो लड़कर
उनका ऋणी देश रहेगा।
मुख से बलिदान की गाथा
हर बच्चा-बच्चा कहेगा॥
एक इंच-इंच भूमि पर
लड़कर के प्राण गंवाये ॥2॥

हिम पर्वत मालाओं पर
पग संभल संभल कर रख रे।
कहां छुपे वतन के दुश्मन
अपनी आँखों से तक रे॥
पड़ते ही नजर अरिदल पर
क्षण में कर ढेर दिया है।
ध्वज लहरा दिया तिरंगा
चौकी पर कब्जा किया है॥
सिंहों की दहाड़ के आगे
सब स्यार भागते पाये ॥3॥

तंग घाटियों में बर्फीली
बह रहा खून वीरों का।
शत-शत अभिनन्दन करने
भारत के रणधीरों का॥
जिसका जल पी अन्न खाया
और धूल में जिसकी खेले।
उस पुण्य भूमि को जबरन है
कौन जो हमसे लेले॥
कर्मठ हर पाक समर्थक
बचकर ना वापिस जाये॥4॥