दास्तां सुनायें किसका अपनी कमी की।

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दास्तां सुनायें किसका अपनी कमी की।

दास्तां सुनायें किसका अपनी कमी की।
फूल बन गये हैं कांटे भूलों से कभी की॥टेक॥
अपनो को अपने आप गले से लगाते जो।
छुआछूत जन्म जातिवाद को मिटाते जो॥
सामना जो करता हिम्मत क्या थी किसी की॥1॥

किये हैं अखण्ड पाठ गीता और रामायण के।
लाल हिन्दुओं के हर दिन मुसलमां ईसाई बनके॥
बोलते रहे जय मौहम्मद ईसा मसीह की॥2॥

श्रीराम कृष्ण की जो हिम्मत को परखती कौम।
धर्म क्या है धर्म की जो हकीकत परखती कौम ॥
जंजीरें टूट जाती सभी बेबसी की ॥3॥

हनुमान की हमने जिन्हें पूजा करते देखा।
आश्चर्य उनको भूत प्रेतों से डरते देखा॥
इससे बढ़कर बात और क्या होगी हंसी की॥4॥

पत्थरों पै फल पत्ते चढ़ाकर मिला है क्या।
अपनी जगह से उनमें एक भी हिला है क्या॥
भले दुश्मनों ने दौलत लूटी सर जमी की॥5॥

देवता पै मथुरा काशी अयोध्या का सोमनाथ।
औरंगजेब नादिर बाबर का ना रोक पाये हाथ॥
मन्दिरों ‘को तोड़ ‘कर्मठ’ मस्जिदें खड़ी की॥6॥