गंगा तट मजा न देगा
गंगा तट मजा न देगा,
जमना तट मजा न देगा।
प्रभु भक्ति के बिना तेरा
अल्फी लट मजा न देगा॥ टेक ॥
चेले ये और चेली,
कितनी ही साथ लेली।
तन तो सजा लिया है
चादर है मन की मैली ॥
प्रियतम की उस मिलन में
जमघट मजा न देगा॥1॥
प्रभु भक्त है ये कैसा,
चाहे हर ही वक्त पैसा।
भोगों में लिप्त रात दिन
वीरक्त है ये कैसा॥
मन के विभक्त रहते,
रंगा पट्ट मजा न देगा॥2॥
देखो तो धूर्त्त ढोगीं,
बैठा है बन के योगी।
करता इलाज जग का,
रहता सदा जो रोगी ॥
नित रमणा रमणियों में
लम्पट मजा न देगा ॥3॥
ओ दास इन्द्रियों के,
नजदीक बस्तियों के।
डेरा जमा के बैठा घर
लूटे ग्रहस्थियों के॥
जब आँख बेशरम हों
घूंघट मजा न देगा॥4॥
अग्नि में तप रहा है,
माला भी जप रहा है।
अन्दर तो वासना का
तुझे सर्प डस रहा है।
नाटक दिखाना जग को
‘कर्मठ’ मजा न देगा॥5॥










