कुछ लोग इस भारत की तस्वीर बिगाड़ रहे।

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कुछ लोग इस भारत की तस्वीर बिगाड़ रहे।

कुछ लोग इस भारत की
तस्वीर बिगाड़ रहे।
ऋषियों और मुनियों का
हरा बाग उजाड़ रहे ॥ टेक ॥
हर रोज चूड़ी बिन्दी से
सोलह श्रृंगार उजड़ते हैं।


हर रोज यहां बेरोक टोक
कितने ही परिवार उजड़ते हैं
पत्नि की मांग उजड़ती है
माता की कोख उजड़ती है।
शब्दों से व्यक्त नहीं होती
जो पीड़ा सहनी पड़ती है।
उफ मासूमों का सीना
संगीनों से फाड़ रहे ॥1॥

वह सितम ना रोके से रुकता
जो जुल्म यहां पर होते हैं।
बूढ़े बेचारे बाप यहां
बेटों की ल्हाशें ढोते हैं।।
सचमुच सपनों के अन्दर
ल्हाशें हैं और चितायें हैं।
गम जिनको सुनाते हैं
वही उनको लताड़ रहे ॥2॥

क्या बच्चे बूढ़े माँ बहनें
सबकी निर्मम हत्याये हैं।
हो रहे बिगत कुछ वर्षों से
कुछ ऐसे काले काम यहां।
हो गई कलंकित मानवता हो
गया धर्म बदनाम यहां॥
हो लक्ष यही संकल्प यही
जैसे हो देश बचाना है॥


गिनती ही बढ़ती जाती है
बेकस बेबस लाचारों की।
लम्बी ही होती जाती है
यहां संख्या अत्याचारों की॥
नेता नाहर बनकर
दिल्ली में दहाड़ रहे॥3॥

बढ़ता ही जाता है
घेरा दुश्मन की घातक चालों का।
हर वक्त बोलबाला है
अब तो देश तोड़ने वालों का॥
जागे शासन जागे समाज
दुखियों को गले लगाना है।
घर में ही ‘कर्मठ’ दुश्मन
जमे पैर उखाड़ रहे ॥4॥