ऐसी लागी लगन प्रभु में हो गई मगन
तेरी हर शै में छवि नजर आने लगी ॥
छोड़ जग के बन्धन आई तेरी शरण
मन में भक्ति की लौ जगमगाने लगी ॥ ऐसी लगी…
पाया मानुष जनम अनमोल रतन (2)
सत्य ज्ञान कर्मों का ये दिव्य भवन (2)
मन का मन्दिर इसी में सजाने लगी ॥ ऐसी लगी…
आत्मा मन बुद्धि जैसे खिले हैं सुमन (2)
प्रभु देता महक इसमें जैसे चन्दन (2)
फूल चरणों में प्रभु के बिछाने लगी ॥ ऐसी लगी…
सत्य जप तप अहिंसा की दे दो अगन (2)
इसके पालन में लागे तन मन व धन (2)
प्रेरणा शक्ति तुमसे मैं पाने लगी ॥ ऐसी लगी..
गहरा सागर प्रभु दूर मंजिल मेरी (2)
नाव मेरी सही पर दया है तेरी (2)
मेरे साँझी मैं तुझको रीझाने लगी ॥ ऐसी लगी…










