ये मन भरमाए चैन ना पाए, मिला जीवन जी, न यूँ ही खोडऽ
बचपन खोया खेल कूद में आई मस्त जवानी
याद किया ना प्रभु प्रीतम को किसने दी जिन्दगानी
अन्त समय लेकर पछतावा रो रो जान गवाए ॥
ये मन भरमाए…
जिसने सकल ब्रह्माण्ड रचाया क्यूँ उसको बिसराया
ज्ञान न पाया जग में रहकर सत्संगत ना आया
काम क्रोध मद मोह में डूबा पापी मन कित जाए ।
ये मन भरमाए…
आऊँ तो आऊँ दाता कैसे मैं आऊँ, तेरे मिलन की राह न पाऊँ ॥
ये मन भरमाए…










