उठो बहनों आँसू बहावोगी कब तक।
उठो बहनों आँसू बहावोगी कब तक।
इस जिन्दगी को खपावोगी कब तक॥
इन जर के भूखों से कर करके शादी,
चिता में बदन को जलावोगी कब तक॥टेक॥
माँ बाप ने बेटी को भार समझा।
ना जीने का इनके अधिकार समझा।
क्यों छीना जाता है अधिकार जीने का।
अधिकार अपना गवांवोगी कब तक ॥1॥उठो
बेटी को जाने क्यों समझा बला है।
बिठा डोली में दी घर से टला है॥
आखिर किसी जुल्म की भी तो हद है।
यहां मार जुल्मों की खावोगी कब तक ॥2॥ उठो
हमें मार डालेगा शादी बन्धन ।
ये मांथे की बिन्दिया हाथों के कंगन॥
खड़ी मौत दुल्हन का इन्तजार करती।
एक दिन को मेंहन्दी रचावोगी कब तक ॥3॥
उठो मिलन दो हृदय का या बाजार है ये।
शादी नहीं एक व्यापार है ये।।
जोड़ा सुहाग का अपना कफन है।
मरघट है ससुराल जावोगी कब तक ॥4॥ उठो
शोहर को बीबी की क्यों याद आये।
एक मरते ही दूसरी घर में आये।
तुम चाहो तो वंश इनका मिटादो।
घर जालिमों के बसावोगी कब तक ॥5॥ उठो
खनक चूड़ियों की रिझाती रहेगी।
बारात सज-सज के आती रहेगी।
बताओ तो अब लाएं बनकर के ‘कर्मठ’।
तुम गम के नगमों को गावोगी कब तक॥6॥उठो










