गुरूवर दया के सागर

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गुरूवर दया के सागर

गुरूवर दया के सागर,
तेरा दर जगत से न्यारा
दुनिया का दर भंवर है,
तेरा ही दर निराला ।।
गुरूवर दया के…।।०।।

अन्तरा – तेरी सृष्टि है निराली,
दुनियां को हरने वाली ।
अन्धों की आखों में भी,
नव ज्योति भरने वाली ।
अज्ञान की तिमिर से,
हर भवनों को उबारा ।।
गुरूवर दया के…।।१।।

तेरा ज्ञान है चौखा,
विज्ञान है अनोखा,
अपनाया उसी को जिसने,
उसने न पाया धोखा ।
जो जुड़ सका न तुमसे,
वह लुट गया बेचारा ।।
गुरूवर दया के…।।२।।

तेरा दर पे सब बराबर,
कोई बड़ा न छोटा ।
चोखा बनाया सबको,
आया भला ही खोटा ।।
जो भी शरण में पहुँचा,
सबको मिला सहारा ।
गुरूवर दया के…।।३।।

दुनियां का रस लुभाता,
मझदार में डुबाता ।
तेरा इस पुनित पावन है,
ईश्वर से मिलाता ।
भवनों की उसी रस में,
भव सिन्धु से उभारा ।
गुरूवर दया के… ।।४।।