हृदय आकाश में गूंजे ओंकार वेद क्या कहते हैं

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हृदय आकाश में गूंजे ओंकार वेद क्या कहते हैं

हृदय आकाश में गूंजे ओंकार
वेद क्या कहते हैं दिव्य ओ३म्
हृदय आकाश में… ।।०।।

अन्तरा – हृदय में एक गुंफा है,
अंगुठे की आकृति ।
उसमें मिलकर रहते हैं,
ईश्वर-जीव-प्रकृति ।
गूंजता दिनरात ये अनाहत नाद… ।।
हृदय आकाश में…।।१।।

जो कुछ बाहर दिखता है,
अन्दर भी मौजुद है।
बाहर जो भी नहीं है वो,
नित्य हृदय में खुद है।
पिण्ड तुल्य ब्रह्माण्ड,
जानते हैं विद्वान् ।।
हृदयाकाश में गुंजे…।।२।।

ओ३म् के गुंजन से ही तो,
आदि हुई यह सृष्टि,
ओ३म् के चिन्तन से ऋषिगण,
पाते हैं दिव्य दृष्टि ।
ओ३म् का ही करके ध्यान,
करते हैं वे प्रणाम ।।
हृदयाकाश में…।।३।।

जल में थल में अमन में भी,
व्यापक पवन गगन में
बादल बिजली वन उपवन,
तन-मन जड़ चेतन में ।
गूंजता दिन रात ये अनाहत नाद ।।
हृदयाकाश में…।।४।।

वाचक एक प्रणव जिसका,
वाच्य ही जगदीश्वर क्लेश कर्म विपाकाशय,
रहित सर्वज्ञ गुरूवर ब्रह्म का
शुभ नाम जपते थे कृष्णराम ।।
हृदयाकाश में…।।५।।