है चाह यही, संकल्प यही

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है चाह यही, संकल्प यही

है चाह यही, संकल्प यही,
हम कुछ करके दिखलाएँगे।
दयानन्द की शिक्षा पाकर,
हम आगे बढ़ते जायेंगे ।।

जो लोग गरीब निराश्रित हैं,
हम उनको गले लगाएँगे।
हम आगे बढ़ते जाएँगे,
हम उन पर सुख बरसाएँगे ।।

जो लोग अंधेरे घर में है,
जो लटके हुए अधर में हैं।
उनके घर-आँगन में निश-दिन,
उद्यम का दीप जलाएँगे।।

जो लोग हारकर बैठे हैं,
उम्मीद मारकर बैठे हैं।
हम उनके बुझे चिरागो में,
फिर से नव जोत जलाएँगे ।।

रोको मत. आगे बढ़ने दो,
आजादी के परवानो को।
हम मात्-भूमि की सेवा में,
अपना सर्वस्व चढ़ाएँगे ।।

हम उन वीरों के बच्चे हैं,
जो दिल से बिल्कुल सच्चे थे।
हम उनका मान बढ़ाकर ही,
कुछ उनका कर्ज चुकाएँगे ।