हे ईश्वर तेरे भक्तों को नहीं रहा है तेरा डर।

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हे ईश्वर तेरे भक्तों को नहीं रहा है तेरा डर।

हे ईश्वर तेरे भक्तों को
नहीं रहा है तेरा डर।
तू इनका तमाशा
देखा कर॥ टेक ॥
जिस दिन से बने हैं वैरागी,
मोह माया व तृष्णा जागी।
कोठी बंगले ही बना रहे
इन्हें भोगी कहोगे या त्यागी॥
क्या धन वैभव की खातिर ही
काषाय वस्त्र चले रंगकर ॥1॥

कोई मुण्डक मुंडा जटाजूट,
संन्यासी बनकर रहे लूट।
वंचित हैं सत्याचरण से
जीवन में इनके झूठ ही झूठ॥
बगुले भक्त देश द्रोहियों ने
पहना कपट का आडम्बर ॥2॥

चल आश्रम के प्रतिकूल रहे,
कर्तव्य को अपने भूल रहे।
स्वाध्याय साधना ताख पै
धर कुछ पदों के ऊपर झूल रहे।।
लोकेषणा ने मारा इनको
हरदम पुजते रहे मंचों पर॥3॥

पल-पल गृहस्थियों मेंही बास है,
इनके संग औरों का नाश है।
तप और त्याग गया भट्टी में
ये सब मन इन्द्रियों के दास हैं
करते रमण रमणियों में जग
जिनको कहता योगेश्वर ॥4॥

तन रेशमी आवरण चढ़े हुए,
गद्दों के ऊपर पड़े हुए।
चेलों के संग चेलियां भी
जिनकी आज्ञा में खड़े हुए॥
भ्रष्ट हैं पाखण्डी पथ से
बनकर बैठे महा मण्डलेश्वर ॥5॥

बहकावों मूर्खी को आओ,
पापों के भोज से बचजाओ।
निश्चय ही मोक्ष प्राप्त होगी
जो सन्तों के दर्शन पाओ॥
कर्मठ नाम दान देकर के
बहका रहे हैं जादूगर॥6॥