ऋषि क्या फरिश्ता था

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ऋषि क्या फरिश्ता था

ऋषि क्या फरिश्ता था
दिलों को करार दे गया।
उजड़े चमन को जो
ये बहार दे गया॥ टेक ॥
फिर भी नहीं जग ने समझा
ढाये सितम उस पर क्या-क्या
जुल्म रात दिन सहता रहा,
अपनी जुबां से कहता रहा।
हे मालिक इन नादानों पर
करते रहना दया॥1॥

मात पिता को छोड़ दिया,
घर से नाता तोड़ लिया।
हिम की चट्टानों पर चढ़ा,
रोक ना पाई अलखनन्दा॥
जख्म पै जख्म लगे पैरों में
फिर भी चलता रहा ॥2॥

मन्दिर चर्च मिनारों में,
धर्म था बन्द पिटारों में।
सच की होली जलती थी,
दाल झूठ की गलती थी।
मजहब पन्थों ने खोला
था अध्याय नया ॥3॥

ठि दीन अनाथ दुखी,
आने पर सब हुए सुखी।
धवाओं की माँग सजी,
वेद की शहनाई थी बजी॥
तम, कपिल, कणांद की
दास्ताँ करता चला बयाँ ॥4॥