दयानन्द धरती पै गुजरात की।
दयानन्द धरती
पै गुजरात की।
चमका किरण बनके
प्रभात की॥ टेक ॥
अमर हो गई माँ
पिसर ऐसा जन कर।
जुबां पर कदर जिसके
जजबात की॥1॥ चमका.
जन्म पर बधाई
मिली होगी कितनी।
हो लम्बी उमर शिशु
नवजात की ॥2॥ चमका.
क्या थी खबर ये
जमाने में एक दिन।
जलायेगा शमां
खयालात की ॥3॥ चमका.
अगर मूल जगता
ना उस रात में।
तो कुछ भी ना कीमत
थी उस रात की॥4॥ चमका.
आँधी क्या तूफां भी
जिसके कदम को।
घटा रोक पाई ना
बरसात की॥5॥ चमका.
वेदों का पैगाम
देने को निकला।
इच्छा न थी जर
जवाहरात की॥6॥ चमका.
सुनने को हमने
सुनी और की भी।
कहानी अरस्तू व
सुकरात की॥7॥ चमका.
थे बन्दे नसीबों के
वो तो ऋषिवर ।
तुझे देखा आँखों
से और बात की॥8॥ चमका.
कांटों ने दामन न
उलझाया उसका।
मगर छेड़ फूलों ने
दिन रात की॥१॥ चमका.
वो क्या था ये कर्मठ
सितारों से पूछो।
फलक के जिन्होंने
मुलाकात की ॥10॥ चमका.










