हमें आते हैं हरदम याद ऋषि के ऐहसान नहीं भूलेंगे।

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हमें आते हैं हरदम याद ऋषि के ऐहसान नहीं भूलेंगे।

हमें आते हैं हरदम याद
ऋषि के ऐहसान नहीं भूलेंगे।
होने से बचे हैं बर्बाद ऋषि के
ऐहसान नहीं भूलेंगे ॥ टोक ॥

बदल-बदल कर भेष रात
दिन लूट रहे थे लुटेरे।
एक नहीं अनगिन छलिया
छलते थे शाम सबेरे ॥
रूख से नकाब हटादी
सबके दीख गये असली चेहरे।
फरिश्तों के रूप में थे जल्लाद
ऋषि के ऐहसान नहीं भूलेंगे ॥1॥

दीन अनाथों विधवाओं
का आया बनके सहारा।
जिन्हें अभागन कहकर के
माँ बाप ने था दुतकारा॥
काशी में जाने के सिवा
कोई और नहीं था चारा।
घर उनके किये आबाद
ऋषि के ऐहसान नहीं भूलेंगे ॥2॥

मत मजहब पन्थों के दुर्ग को
जड़ से हिला दिया था।
सदियों के प्यासों ने वेद का
अमृत पान किया था॥
भूल चुके थे दास्तां जिनकी
उनका नाम लिया था।
गौतम कपिल कणाद ऋषि
के ऐहसान नहीं भूलेंगे ॥3॥

छलके थे स्वामी के नयन
जब दिन देखे थे पतन के।
मरने पर भी गैरों के
यहां थे मौहताज कफन के॥
दयानन्द की दया से
कर्मठ बन्द टूटे बन्धन के।
हम फिर से हुए हैं आजाद
ऋषि के ऐहसान नहीं भूलेंगे॥4॥