जग में वेदों की, बंसुरिया बजाई ऋषि ने
जग में वेदों की, बंसुरिया बजाई ऋषि ने,
बजाई ऋषि ने, बजाई ऋषि ने,
जग में……..
भूले हुए मार्ग अपने को,
भारत के नर-नारी,
छायी हुई अविद्या की थी,
जग में घोर अँधियारी,
तो सबको वैदिक धर्म डगरिया
बताई ऋषि ने ॥ १ ॥
विद्यालय गुरुकुल खुलवाये,
जारी करी पढ़ाई,
जहाँ अविद्या का डेरा वहाँ
ज्ञान की गंगा बहाई,
तो बनके अमृत की बदरिया
बरसाई ऋषि ने ॥ २॥
भैंसा, बकरा काट-काट
देवी पर खून बहाते,
यज्ञो में पशुबलि देते वे,
कैसा पाप कमाते,
तो सिर से पापों की गठरिया,
गिराई ऋषि ने ॥ ३॥
विधवा दीन अनाथों का ऋषि,
बनकर रहा सहारा,
पोप और पाखण्डी डरकर,
कर गये साफ किनारा,
तो “राघव” डूबतीं नवरिया
बचाई ऋषि ने ॥५॥










