हे अग्ने व्रतपति परमेश्वर
हे अग्ने व्रतपति परमेश्वर,
करूणा-सागर करूणा करना।
मैं आज व्रती बन आया हूँ,
मेरा व्रत नाथ सफल करना ॥
हे शिवशंकर, हे अभयशंकर,
मन चञ्चल दुर्बल है मेरा।
दे दो शक्ति, व्रत भंग न हो,
व्रत-पथ के विघ्न सभी हरना ॥
तू मेरा है मैं तेरा हूँ,
यह भाव मुझे बल देता है।
संकल्प सदा दृढ़, देव रहे,
ऐसी शक्ति मन में भरना ॥
व्रत सिद्धि में मैं सजग रहूँ,
प्रगति पथ में बढ़ता जाऊँ।
हे प्रेरक, प्रेरित कर देना,
मैं सीखूँ पापों से डरना ॥
‘मैं त्याग करूँगा अमृत का,
अयथार्थ असत्य, अपावन का।’
संघर्ष करूँगा दुरितों से,
सिखला दो पापों से लड़ना ॥
शुभ सत्य-सुपथ का पथिक बनूँ,
मैं ‘पाल’ श्रेय-पथ पै ही चलूँ।
मैं लक्ष्य बना लूँ जीवन का,
सत्पथ की ओर सदा बढ़ना ॥










