देव ! तुम्हारे कई ‘उपासक’ कई ढंग से आते हैं।

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देव ! तुम्हारे कई ‘उपासक’ कई ढंग से आते हैं।

देव ! तुम्हारे कई ‘उपासक’
कई ढंग से आते हैं।
पूजा की सामग्री वे प्रभु
विविध रंग की लाते हैं।।

मैं गरीबिनी अति निष्किञ्चन
खाली हाथ चली आई।
पूजा की विधि नहीं जानती,
फिर भी देव ! चली आई ॥

धूप दीप नैवेद्य नहीं है,
पूजा का उपचार नहीं।
हाय! गले में मेलन को प्रभु,
फूलों का भी हार नहीं कैसे
स्तुति करूँ तुम्हारी है,
स्वर में माधुर्य नहीं।

मन के भाव प्रकट करने
को वाणी में चातुर्य नहीं।
पूजा और पूजापा प्रभुवर !
इसी पुजारिन को समझो।
दान-दक्षिणा और निछावर
इसी भिखारिन को समझो ॥

चरणों में अर्पित है इसको
चाहो तो स्वीकार करो।
है यह वस्तु तुम्हारी ही प्रभु,
ठुकरा दो या प्यार करो ॥