प्रभु को जानिये, बाद में मानिये
प्रभु को जानिये, बाद में मानिये,
इन बहुरुपियो को पहचानिये।
जो खुद को भगवान् कहते हैं।
सत प्रकृति चित्त जीवात्मा,
सच्चिदानन्द है वो परमात्मा।
दिखलाई आँखो से ना दे सके
है इस लिए निराकार परमात्मा।
मोहताज वो किसी का नहीं
सर्व शक्ति मान कहते हैं।
उसी को भगवान् कहते हैं।
कर्मों की सजा दे न माफ करे,
न्यायकारी है इन्साफ करे।
देदी स्वतन्त्रता मानव को पुण्य करे,
चाहे पाप करे। करता दया सब
जीवों पे जो उसको महान् कहते हैं।
उसी को भगवान् कहते हैं।
गर्भ से माँ के जो ना जन्म ले,
अजन्मा जिसका न अन्त मिले।
जो सब विकारों से दूर हो
ऐसा न साधु महन्त मिले।
अनादि न जिस का आदि मिले
उसे अनुपम ज्ञान कहते हैं।
उसी को भगवान् कहते हैं।
सर्वाधार हैं वो ईश्वर,
राजों का राजा है सर्वेश्वर।
सर्व व्यापक कण-कण में रमा
सबके अन्तर की रखता है खबर।
जरा अवस्था जिसको आती
नहीं उसको जवान कहते हैं।
उसी को भगवान् कहते हैं।
जो हैं अजर वो रहता अमर,
अभय किसी का नहीं उसको डर।
‘नित्य’ पवित्र सृष्टि कर्त्ता है जो
उसकी उपासना सुबह शाम करते हैं।
रखो इन्हें याद हरदम नरेश प्रभु
की पहचान कहते हैं।
उसी को भगवान् कहते हैं।
प्रसिद्ध भजनोपदेशक श्री
नरेशदत्त जी आर्य ने आर्यसमाज
के द्वितीय नियम पर ईश्वर की
झाँकी प्रस्तुत की है।










