पक्षपात और अपस्वार्थ को छोड़ सरल होकर तू ध्यान।
(लावनी)
पक्षपात और अपस्वार्थ को
छोड़ सरल होकर तू ध्यान।
न्याय तुला पर तोल दिखाऊँ,
जो पूरा हो उस को मान।
चौक १
इधर अजन्मा, अमृत्यु है,
उधर जन्मता और मरता है।
इधर है आनन्दस्वरूप ईश्वर,
उधर दुःख सुख में पड़ता।
इधर अभय नित्य अविनाशी है,
उधर छबूंदर से डरता।
इधर अचल अखण्ड एक रस,
उधर गाँठ बाँधे फिरता।
इधर है ईश्वर सर्वशक्तिमान्,
उधर झाड़ जड़ द्रव्य पाषाण।
न्याय तुला पर तोल दिखाऊँ,
जो पूरा हो उस को मान।
चौक २
इधर सनातन वेद का पुस्तक,
उधर नये नये अनेक ग्रन्थ।
इधर एक मत वेद सनातन,
उधर सम्प्रदा लाखों पन्थ।
इधर है ब्राह्मण कर्म पै केवल,
उधर जन्म पै है वे अन्त ।
इधर है ईश्वर अथाह अगोचर,
उधर ईश्वर का आद और अन्त ।
इधर प्रभु है सर्वव्यापक,
उधर डिबिया में विराजमान ।
न्याय तुला पर तोल दिखाऊँ
जो पूरा हो उस को मान ।
चौक ३
इधर हवन से पवन सुधारें,
पका मांस रहे उधर बिगाड़ ।
इधर मलाई मक्खन भोजन,
उधर चबा रहे कड़े कड़े हाड़।
इधर दमन इन्द्रियों की आज्ञा,
उधर नहीं इक थमती जाड़।
इधर धर्म का झंडा गाड़ें,
उधर अधर्मी रहे उखाड़।
इधर उन्नति गौ रक्षा की,
उधर गौ की कर रहे हान।
न्याय तुला पर तोल दिखाऊँ
जो पूरा हो उस को मान ।
चौक ४
इधर शुद्ध बुद्ध मुक्त विज्ञानी,
उधर भ्रम में पड़ा हुआ।
इधर आकाशवत परिपूर्ण है,
उधर मन्दिर में खड़ा हुआ।
इधर सकल सृष्टि का कर्त्ता,
उधर मनुष्य का घड़ा हुआ।
इधर नाड़ी नस का नहीं बन्धन,
उधर ज़र्मी में गड़ा हुआ।










