धर्म के हेतु जो कट जाए माथ मुझको दो।

0
8

धर्म के हेतु जो कट जाए माथ मुझको दो।

धर्म के हेतु जो कट जाए माथ मुझको दो।
जो कि गिरतों को उठा ले वो हाथ मुझको दो।
तड़प उठे जो देखकर पराई पीड़ा को,
दिल वो दर्दीला दया करके नाथ मुझको दो ॥

दयालो, दया बस यही मुझ पै कर दो।
ये प्याला मेरा प्रेम-अमृत से भर दो ॥
किसी के लगे जख्म मैं तड़प उठूं ।
मुझे ऐसा दिल और ऐसा जिगर दो ॥

जिसे देख लूँ बस वो हो जाए मेरा।
मुझे ऐसी नीकी व मीठी नज़र दो ॥
हकीकत व बैरागी बन्दा के मानिन्द ।
धरम के लिए काम आए वो सर दो ॥

जगत् के बखेड़ों में भूले न तुझको ।
‘प्रकाशार्य’ को बस यही एक वर दो ॥