तू है इनसान और वह है भगवान

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तू है इनसान और वह है भगवान

(तर्ज – मै हूँ मजबूर मेरी मंजिल है दूर काही रास्ते में)

तू है इनसान और वह है भगवान ।
तेरा प्यार उसका प्यार बन जाए।
तो यह ज़िन्दगी गुलज़ार बन जाए।
तू है इनसान और…….

वह मेहमान बैठा घर खास तेरे ।
तू पास उसके है वह पास तेरे ।
काहे अनजान तेरी चुप है जबान,
रोम रोम से पुकार बन जाए।
तो यही ज़िन्दगी गुलज़ार बन जाए।
तू है इनसान और………

मिल जाएँ और चाहे लाखों के सहारे ।
प्रभु के बगैर फीके सारे के सारे ।
सर्व शक्तिमान जो है सब से महान,
यदि एक वह आधार बन जाए।
तो यह जिन्दगी गुलज़ार बन जाए।
तू है इनसान और……..

“पथिक” न लौट जाना मञ्जिल पे आके।
यों खाली हाथ सारी आयु गंवा के ।
क्यों है सुनसान तेरे दिल का जहान,
इस में प्रेम की बहार बन जाए।
तो यह ज़िन्दगी गुलज़ार बन जाए।
तू है इनसान और………