तेरा “सत् चित् आनन्द” रूप,कोई कोई जाने रे।

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तेरा “सत् चित् आनन्द” रूप, कोई कोई जाने रे।

तेरा “सत् चित् आनन्द” रूप,
कोई कोई जाने रे।
मन वाणी का तू है स्रष्टा वेद
वाणी का तू है तू है ज्ञानस्वरूप,
कोई कोई जाने रे…..

पाँच तत्व से बना नहीं तू,
तीन गुणों से सना नहीं तू,
तेरा अनुपम अटल स्वरूप,
कोई कोई जाने रे….

जन्ममरण तेरा धर्म नहीं है,
पाप पुण्य तेरा कर्म नहीं है,
तू है पुण्यस्वरूप, कोई कोई जान रे…..

सकल जगत् का कर्त्ता-धर्ता,
सकल विश्व का पालन करता,
तू है सबका भूप, कोई-कोई जाने रे….

तीन लोक का तू है स्वामी,
घट-घट व्यापक अन्तर्यामी,
ज्यों माला में सूत, कोई-कोई जाने रे..