दयानन्द आए हम सर को झुकाए चरणों में चरणों में
तर्ज: दुनियाँ ना भाये मोहे
दयानन्द आए हम सर को झुकाए चरणों में चरणों में
शिव के दर्शन को ऋषि तरसे गुरु के चरणों में आए
बाँट दिया गुरुज्ञान को जग में शिष्य गुरु के कहलाए
ज्ञान के ये मोती रखना है सम्भाले चरणों में चरणों में दयानन्द….
तेरी दया से दीन दुःखी के भाग्य जो सोए थे जागे
तूने बजाई वेद की बन्सी सारी दुनियाँ के आगे
अपने भी आए संग आए पराए चरणों में चरणों में ॥ दयानन्द…
ईंट पत्थर की चोटें खा के अमृत के प्याले बंटि
तुमने कृपा की दुष्टों पर जो विष के प्याले दे जाते
शर्मसार होते काले मुँह को छुपाए चरणों में चरणों में॥ दयानन्द…
वेद ज्ञान सागर छलकाए मतवादी डर के भागे
तर्क से सत्य उजागर करके वेद के मार्ग पे ले आए
शत्रु जो बने थे ऋषि के मित्र बनके आए चरणों में चरणों में॥ दयानन्द……
ऋषिगीत मेरे संग सहारे मन की उमँगों में जागे
तेरे गीत में कैसे गाऊँ नीरस वाणी तो जागे
गीत स्वरों की माला भेंट चढ़ाए चरणों में चरणों में॥ दयानन्द !!










