आई दिवाली काल कराल की बन गई काली धूल

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आई दिवाली काल कराल की बन गई काली धूल

तर्ज: इन्तज़ार और अभी और अभी
(ऋषि निर्वाण)

आई दिवाली काल कराल की बन गई काली धूल
अपने हाथों दीप बुझाया कैसी हो गई भूल ॥
आई थी भोर सुनहरी वो हमें छोड़ गई
ऋषि दयानन्द की यादों से हमें जोड़ गई ॥ आई थी…

ज्योत बुझी अँधियारा कर गई बुझे गगन के तारे
इक इक कर रवि शशि भी बुझ गए शोक में डूबे सारे ॥ आई थी…
भोर भई पर ऋषि ना आए याद ऋषि की आई
लाखों दीए जला कर गया, ऋषि हर दीए में दिए दिखाई ॥ आई थी…