प्रभु को देख रही है नज़र नज़ारों में, खिले हैं फूल ये रंगी सदा बहारों में
तर्ज : बहार बनके जो आए हो दिल की राहों में
प्रभु को देख रही है नज़र नज़ारों में, खिले हैं फूल ये रंगी सदा बहारों में ॥
महक गुलों में चहक बुलबुलों पपीहों में ॥ प्रभु को ॥
खड़कते पत्तों में सुर है लचकती डालों में
हरेक वस्तु है चलती तेरे इशारों से, हवाएँ गा रहीं लय में तेरे तरानों को
तरस रहे हैं तेरे दीप जगमगाने को
तेरी ही ज्योत है सूरज व चाँद तारों में ॥ खिले हैं ॥
है राग नदियों का वहती हुई लकीरों में,
गगन को चूमते पर्वत के इन जजीरों में
घटाएँ घूम वरसती सहस्त्र धारों में ॥ खिले हैं ॥
जहान कैसा अनोखा सजाया है प्रभुवर,
खुशी से महिमा तेरी गा रहे हैं सब मिलकर
तेरी दया का है सागर खड़े किनारों पे ॥ खिले हैं ॥
(गुल) फूल, पुष्प (जजीरा) पहाड़ पर बनी झील










