निढाल गऊएं पुकारती हैं

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निढाल गऊएं पुकारती हैं

निढाल गऊएं पुकारती हैं,
सभी तरफ ये निहारती हैं।
कहीं तो होगा हमारा रक्षक,
नजर न कोई भी आ रहा है।।

उठो वतन के ऐ नौजवानो,
यह वक्त तुमको बुला रहा है।
सभी की नजरें लगी हैं तुम पर,
हर एक दिल गुनगुना रहा है।।

कहीं पे मण्डियां कबाब की हैं,
कहीं पे नदियां शराब की हैं।
गगन से ऊंचा ये देश मेरा,
पतन के सागर में जा रहा है।।

कहीं मुसलमां कहीं ईसाई,
बने विधर्मी हमारे भाई।
जिसे ऋषि ने कुचल दिया था,
वो सांप फिर सर उठा रहा है।।

उठो जवानी की शान बनकर,
शिवाजी राणा चौहान बनकर ।
तुम्हारे घर में छुपा है दुश्मन,
जो योजनाएं बना रहा है।।

उठो जमाना बदल के रख दो,
बुरे इरादे मसल के रख दो।
खड़ा हिमालय बहादुरी की,
कथा तुम्हारी सुना रहा है।।

उठो ऐ भारत के नौनिहालो,
उठो वतन की दशा संभालो
“पथिक” अंधेरे में सूर्य तुम हो,
ये गीत इतिहास गा रहा है।।