जन जगत के जगाने
जन जगत के जगाने,
धर्म के बचाने को,
फागुन की रात आई।
नाम हिन्दुओं का
मिटा जा रहा था,
वेदों का सूरज छुपा जा रहा था।
वेदों के सूरज को पुनः जगमगाने
को शिवरात आज आई ।।……..
सहारा अनाथों को न देता
था कोई लाज विधवाओं
की न बचाता था कोई।
पुनः विधवा शादी की प्रथा
के चलाने को फागुन की रात आई ।।.
विश्व गुरु भारत भरमा रहा था,
पत्थर को ईश्वर बतला रहा था।
सत्य ईश का स्वरूप हमें दर्शाने
को ही शिवरात आज आई ।।….
नारी जाति की कोई इज्जत नहीं थी,
‘नरकस्य द्वार’ कही जा रही थी।
इन्हें पूजा योग्य स्थान दिलाने को
फागुन की रात आई ।।…
रामोकृष्ण का बाग देखा उजड़ता,
सभ्यता पुरानी को देखा उखड़ता ।
दयानन्द के लाने को बृज के गीत
गाने को फागुन की रात आई ।।.










