जगदीश हमें ये वर देना
जगदीश हमें ये वर देना,
हम ऐसी नारी बन जायें।
करती रहें संध्या, यज्ञ-हवन
पति आज्ञाकारी बन जायें।।
पति नेत्रहीन जिन जान लई,
मन में ये प्रतिज्ञा ठान लई।
आंखों पर पट्टी बांध लई,
माता गांधारी बन जायें ।।
चल दिये अवध तज रघुराई,
सीता भी संग वन को धाई।
ना लंकपति से दहलाई,
वह जनक दुलारी बन जायें।।
झांसी की लक्ष्मीबाई थी,
गोरों से करी लड़ाई थी।
रण अन्दर तेग चलाई थी,
वह तेग दुधारी बन जायें ।।
चले हरिश्चन्द्र तज रजधानी,
बिक गये जाय तीनों प्राणी।
वन गयी टहलनी पटरानी,
वह तारा प्यारी बन जायें।।
जहां जन्मे दयानन्द स्वामी,
लेखराम श्रद्धानन्द बलिदानी।
“राघव” विनती अंतर्यामी,
ऐसी महतारी बन जायें।।










